Monday, October 19, 2009

पता ही नहीं चलता

आंसुओं को क़ैद करने की कोशिश तो करता हूँ,

मगर हर बार मैं ख़ुद उनकी क़ैद में होता हूँ,

पता ही नहीं चलता कब मुस्कुराते होंठ भिंचने लगते हैं,

और कब आँखें डबडबा जाती हैं।

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