Sunday, December 27, 2009

जर्नलिज्म





अपनी पहचान को शक्ल देना आसन नहीं होता,
खासकर तब, जब आपके पास शक्ल नहीं होती,
आपके हुनर की क़द्र तो बस तब तक की जाती है,
जब तक आपके पास इस्तेमाल लायक अक्ल नहीं होती.
दूसरों की आवाज़ उठाने का दावा तो तुम करते हो,
तुम्हारी खुद की आवाज़ नक्कारखाने में तूती होती है,
अगर न हो तुम्हारे सर पर किसी धर्मपिता का हाथ,
तुम्हारी मेहनत सिर्फ उनके पैर की जूती होती है.
घुटन, कुढ़न, हताशा और निराशा तुम्हारे साथी होते हैं,
और काबिलियत तुम्हारे तलवे चाटने से तय होती है,
तुम्हारी पतंग कितनी ऊँची गई, ये मायने नहीं रखता,
कामयाबी तो दूसरों की डोर काटने से तय होती है.

3 comments:

sharad said...

jhakas bhai, sab jante hain lekin koi kuchha likhana nahi chahta. pani me rahkar magar se bair karne se ghabarate hain log!!!!!!!!!!!!

shuchita said...

beautiful, this is true journalism

Sitanshu said...

Unfortunately the truth of Indian media industry we are working for Dheeraj ji....