Monday, February 22, 2010

एक रात इतवार की


घिरा हुआ हूँ तनहाइयों में, एक बेचैनी सी महसूस करता हूँ,
कई बार जी करता है चीख कर बता दूं, पर सच कहने से डरता हूँ.
हर रात मन के कागज़ पर काली स्याही पोत जाती है,
वो कालिख आँखों में भर जाती है, जब कागज़ छूकर देखता हूँ.
अँधा कुआँ, अँधेरी गलियां और अंधियारी रात ही दिखती है,
तेरी यादों के साए जकड़ लेते हैं, मैं तुझसे मिलने को तड़पता हूँ.
सुबह की उजली धूप भी ठंडी मौत सी सफ़ेद हो जाती है,
आसमान को ताकती पथराई आँखों के सहारे, तेरी आवाज़ टटोलता हूँ.
अकेलेपन के फंदे में फँसी रूह, गर्म लावे सी उबलने लगती है,
अपने हाथों में भरकर ख्वाबों के टुकड़े, तेरे होंठों की बूँद ढूंढता हूँ.

2 comments:

anarchicanalogy said...

लेटा हुआ हूं बिस्तर में, एक बेचैनी सी महसूस करता हूं
कई बार जी करता है कि ख़ुद ही कर लूं, पर करने से डरता हूं
हर रात काली चादर पर सफेद स्याही पुत जाती है
क्या करूं...वो भर जाती है जब, तो अपने आप निकल आती है
अंधा कुंआ, अंधेरी गलियां और अंधियारी रात ही दिखती है
तेरी यादों से काम नहीं चलता, अब तेरी ** को तड़पता हूं
सुबह की उजली धूप में हर सफेदी चमकती है
मेरी बाई रोज़ आकर मुझ पर चिल्लाती है
कहती है कि क्यों रोज़ रूह उबलकर छलकती है
कुछ तो कंट्रोल करो... हर छोटी सी बात पर टपक जाती है

Ambaree said...

Disgusting Sid!