Wednesday, October 13, 2010

मैं और मेरी तन्हाई

कभी कभी मन करता है कुचल डालूँ अपनी तन्हाई को चीखों से,
लेकिन अफ़सोस कि तन्हाई का कोई ओर-छोर नहीं मिलता,

मन में सिमटी तन्हाई कभी मीलों तक फ़ैल जाती है,
और जकड़ लेती है मेरी उम्मीदों को अपने पंजों में.
चूर होती उम्मीदें असहाय सी मुझे देखती रहती हैं,
लेकिन मैं तो किसी शून्य में ताक रहा होता हूँ,
तन्हाई के पंजे से निकलने कि तड़प का भी असर नहीं होता,
चीखने की कोशिश होती है लेकिन गले से आवाज़ नहीं निकलती.
मेरी हर शाम तन्हाई अपने आगोश में समेट लेती है,
और बदले में दे जाती है कालिख से पुता अँधियारा,
उजालों के टुकड़े से भरी मुट्ठी भी खुल नहीं पाती,
क्योंकि हाथों को नाकामी के डर ने जकड़ा होता है.

1 comments:

Sitanshu said...

शायद हम सब की यही हालत है.. और हम सब के जेहन में कुछ ऐसी ही भावना दिन-रात आती है। कभी-कभार नतमस्तक हो जाने का दिल करता है, लेकिन शायद सामाजिक बंधन से बंधे होने के कारण ऐसा नहीं कर पाता हूं। बस इस उम्मीद के साथ जीता हूं.. कि शायद आगे का दिन अच्छा हो...